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June 02, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / अगर जिम में घंटों कसरत करके या फिर महंगी-महंगी दवाइयां खाने के बावजूद भी आप अपना वजन कम नहीं कर पाएं हैं तो भी टेंशन न लें। आप सोच रहे होंगे भला ये क्या बात हुई, आजकल ज्यादातर रोग बढ़ते वजन या मोटापे की ही देन हैं तो चिंता भला क्यों न करें। तो आपको बता दें, अगर आप भी उन लोगों की लिस्ट में शामिल है जो अपने मोटापे से निजात पाना चाहते हैं तो बिना किसी झंझट, बस अपनी डाइट में करें ये छोटे-छोटे बदलाव। आइए जानते हैं क्या हैं ये बदलाव।

1-भोजन के लिए छोटी प्लेट का करें इस्तेमाल-
मोटापा कम करने के लिए सबसे पहले पोर्शन कंट्रोल का फॉर्मूला अपनाएं। सबसे पहले यह जान लें कि वजन कम करने के लिए आपको सीमित मात्रा में कैलोरी खाने की जरूरत होती है। यदि आप अपने लिए एक छोटी डिनर प्लेट बनाते हैं और कोशिश करते हैं कि उसे दोबारा नहीं भरेंगे, तो आप अधिक भोजन करने से बच जाएंगे।

2-दोपहर को करें स्नैक्स का सेवन-
लंच और डिनर के बीच का अंतर अधिक होने की वजह से कई बार लोग डिनर में अधिक भोजन कर लेते हैं। इससे बचने के लिए अपने स्नैक्स को दोपहर में देर से खाएं ताकि रात को आपको भूख न लगे। कोशिश करें अपने आहार में उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करें, ताकि आपको जल्दी भूख न लगे।

3-भोजन करने से पहले कोई गर्म पेय जरूर पिएं-
अध्ययन बताते हैं कि अपने भोजन से पहले कुछ गर्म पीने से व्यक्ति को कम भूख लगती है। इसके लिए आप सूप की कटोरी को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।

4-दूसरों की थाली से न खाएं-
दूसरों की प्लेट से छोटे-छोटे बाइट लेकर खाना भी आपके वजन कम करने के लक्ष्य को बिगाड़ सकता है। दरअसल, व्यक्ति का मस्तिष्क इस तरह के भोजन को नहीं गिनता और वो अधिक भोजन का सेवन कर लेता है। यही वजह है कि व्यक्ति को हमेशा अपनी ही प्लेट से खाने की सलाह दी जाती है।

5-जल्दी डिनर करें-
बिस्तर पर जाने से कम से कम 2 घंटे पहले आपको अपना भोजन करना चाहिए। वजन कम करना चाहते हैं तो शाम 7 बजे तक अपना डिनर कर लें।

 

सक्सेस मंत्र / शौर्यपथ / जो मनुष्य सफलता की राह में जितने ज्यादा जोखिम और कष्ट उठाता है वह अपने जीवन में उतना ही ज्यादा सफल इंसान बनता है। बावजूद इसके इन 5 चीजों की कमी किसी भी व्यक्ति के लिए कई बार असफलता का कारण बन जाती हैं। आइए जानते हैं क्या हैं ये 5 चीजें।

1-जीवन में लक्ष्य की कमी-
जब तक व्यक्ति के जीवन में कोई लक्ष्य नहीं होता वह कभी सफल नहीं हो सकता। सफलता का स्वाद चखने के लिए हर व्यक्ति के पास एक लक्ष्य का होना जरूरी होता है। सफलता की सीढी का पहला कदम एक निर्धारित लक्ष्य का होना है।

2-लोगों से डर-
आपने कई बार ऐसे लोग देखे होंगे जो दूसरे व्यक्तियों से बात करने में हिचकिचाते हैं, जिसकी वजह से हुनरमंद होने के बावजूद भी सफलता उन्हें छूकर निकल जाती है। यदि आप भी जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो लोगों के सामने निडर होकर उनके प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करें, अपने विचारों को खुलकर दूसरों के सामने रखें।

3-विनम्रता की कमी-
जीवन में विनम्रता के बिना कोई भी व्यक्ति सफल नहीं बन सकता । जीवन में सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति के भीतर हर दिन कुछ नया सीखने की चाह मौजूद होनी चाहिए। इसके लिए व्यक्ति के स्वभाव का विनम्र होना बेहद जरूरी है।

4-खुद को परफेक्शनिस्ट मानना-
मैं ही सबसे समझदार हूं, मुझे ही सब आता है। अगर आप भी इस तरह का नजरिया ऱखते हैं तो आप गलत हैं। इस तरह का नजरिया आपके असफल होने की संभावनाओं को बढ़ाता है। अगर आप खुद और दूसरों को बिल्कुल सटीक नतीजों की परवाह किए बगैर अच्छा करने देंगे तो आपके फेल होने की आशंका कम हो जाती है।

5-बहस न करें-
याद रखें बहस में कभी भी किसी मुद्दे का हल नहीं निकलता जबकि सोच समझ कर बातचीत करने से सभी मुश्किलों का हल निकलता है ।

 

धर्म संसार /शौर्यपथ / भगवान श्रीगणेश प्रथम पूज्य हैं। उनकी आराधना से विद्या, बुद्धि, विवेक, यश, सिद्धि सहजता से प्राप्त हो जाते हैं। उनके कानों में वैदिक ज्ञान, मस्तक में ब्रह्मलोक, आंखों में लक्ष्य, दाएं हाथ में वरदान, बाएं हाथ में अन्न, सूंड में धर्म, पेट में सुख-समृद्धि, नाभि में ब्रह्मांड और चरणों में सप्तलोक हैं।

आदिपूज्य भगवान श्रीगणेश को व्रकतुंड, विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति आदि कई नामों से पुकारा जाता है। उनके हर नाम के साथ एक कथा जुड़ी हुई है। अक्षरों के अधिपति होने के कारण उन्हें श्रीगणेश कहा जाता है, इसलिए भगवान श्रीगणेश विद्या-बुद्धि के दाता कहे जाते हैं। भगवान शिव ने श्रीगणेश को वरदान दिया कि सभी देवताओं के पूजन में सबसे पहले पूजे जाने के अधिकारी वह ही होंगे। भगवान श्रीगणेश की रिद्धि और सिद्धि नामक दो पत्नियां हैं और शुभ-लाभ नामक दो पुत्र हैं। भगवान श्रीगणेश की पूजा में कभी भी तुलसी नहीं अर्पित की जाती है। महाभारत में उनके स्वरूप और उपनिषदों में उनकी शक्ति का वर्णन है। महर्षि वेदव्यास के कहने पर भगवान श्रीगणेश ने महाभारत का लेखन किया। दस दिन में महाभारत का लेखन संपन्न हो गया, लेकिन लगातार लिखने की वजह से भगवान श्रीगणेश का तापमान बहुत अधिक हो गया। इसलिए उन्हें सरोवर में डुबकी लगानी पड़ी। यही कारण है कि गणेश उत्सव पर दस दिन तक भगवान श्रीगणेश का पूजन करने के बाद अनंत चतुर्दशी को उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। भगवान श्रीगणेश का वाहन डिंक नामक मूषक है। एक दंत होने के कारण भगवान श्रीगणेश को एकदंत भी कहा जाता है।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / रामलला अब चक्रवर्ती नरेश के रूप में भक्तों को दर्शन देकर उनका कुशलक्षेम जानने बाहर भी निकला करेंगे। इसी भाव को लेकर रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने हर माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर रामलला की शोभायात्रा निकालने पर विचार कर रहा है। यह शोभायात्रा रामजन्मभूमि परिसर से सरयू तट तक निकाली जाएगी। यहां सरयू दर्शन के उपरांत दक्षिणात्य पद्धति से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कल्याण महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।

चैत्र रामनवमी पर निकलेगी वार्षिक यात्रा-
चैत्र रामनवमी के अवसर पर विराजमान रामलला की वार्षिक यात्रा भी निकाली जाएगी। यह यात्रा मध्याह्न भगवान के प्राकट्योत्सव के उपरांत निकाली जाएगी। उड़ीसा के जगन्नाथपुरी की रथयात्रा की तर्ज पर इस शोभायात्रा में भगवान स्वयं नगर दर्शन के लिए निकलेंगे और आम श्रद्धालुओं को राज प्रासाद के बाहर आकर दर्शन देंगे। इस यात्रा में रामलला के साथ उनके तीनों अनुज क्रमश: भरत-शत्रुघ्नन, लक्ष्मण भी अलग-अलग रथारूढ़ होंगे। इस शाही यात्रा का मार्ग सम्पूर्ण रामकोट परिक्षेत्र रहा करेगा। इससे मेला क्षेत्र में कोई व्यवधान भी नहीं आएगा।

अभी प्रतिवर्ष पौष मास में निकलती है शोभायात्रा-
22/23 दिसम्बर 1949 के बाद से रामजन्मभूमि सेवा समिति के तत्वावधान में प्रतिवर्ष पौष मास में रामलला का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। नौ दिवसीय उत्सव के अंतिम दिन भगवान की शोभायात्रा सम्पूर्ण रामकोट परिक्षेत्र में निकाली जाती है। छह दिसम्बर 92 की घटना के बाद भी उत्सव यथावत रामजन्मभूमि परिसर में ही मनाया जाता रहा लेकिन वर्ष 2003 में शिलादान प्रकरण के बाद से नौ दिवसीय उत्सव प्रतीकात्मक हो गया और रिसीवर की ओर से अंतिम दो दिनों के लिए ही अनुमति दी जाती रही है।

चैत्र रामनवमी पर अम्माजी मंदिर से आज भी निकलती है शोभायात्रा-
अयोध्या। दक्षिण भारतीय परम्परा के अम्माजी मंदिर में चैत्र रामनवमी के अवसर पर पंच दिवसीय ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। इस मौके पर प्रतिदिन सायं भगवान की शोभायात्रा अलग-अलग वाहनों से निकाली जाती है। यह शोभायात्रा सायंकालीन बेला में निकाली जाती है। दक्षिण भारत के एक अन्य मंदिर नाटुकोट्टै नगरत्तार छत्रम से भी प्रत्येक रामनवमी के अवसर पर भगवान के प्राकट्य के बाद मध्याह्न में ही शोभायात्रा निकाली जाती थी। वर्ष 2005 में रामजन्मभूमि परिसर में लश्करे तैय्यबा के फिदायीन दस्ते के हमले के बाद शोभायात्रा बंद करा दी गई।

 

खेल /शौर्यपथ / मोहम्मद नबी के ऑलराउंड खेल, रस्टन चेज और स्कॉट कुगलीन की शानदार गेंदबाजी से सेंट लूसिया जॉक्स ने कैरेबियाई प्रीमियर लीग (सीपीएल) मैच में सेंट कीट्स एंड नेविस पैट्रियट को 10 रन से हराया। इस जीत से डेरेन सैमी की अगुवाई वाली टीम प्वॉइंट टेबल में टॉप पर पहु्ंच गई है। उसके तीन मैचों में चार प्वॉइंट्स हैं, जबकि पैट्रियट को लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। पहले बल्लेबाजी का न्योता मिलने पर जॉक्स 12वें ओवर तक एक विकेट पर 102 रन बनाकर अच्छी स्थिति में था, लेकिन सलामी बल्लेबाज आंद्रे फ्लैचर (46) के आउट होते ही उसकी पारी बिखर गयी और 18वें ओवर में स्कोर छह विकेट पर 137 रन हो गया।

छठे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए उतरे नबी ने 22 गेंदों पर नॉटआउट 35 रन बनाए, जिससे जॉक्स 20 ओवर में छह विकेट पर 172 रन तक पहुंचने में सफल रहा, जो इस सीपीएल में अब तक का सर्वोच्च स्कोर है। आखिरी दो ओवरों में 32 रन बटोरने वाले नबी ने एक चौका और तीन छक्के लगाए। अफगानिस्तान के इस ऑलराउंडर ने इसके बाद चार ओवर में 17 रन देकर एक विकेट लिया और पैट्रियट को आठ विकेट पर 162 रन पर रोकने में अहम भूमिका निभाई। कुगलीन ने 33 रन देकर चार और चेज ने 12 रन देकर तीन विकेट लिए।

एक अन्य मैच में गयाना अमेजॉन वॉरियर्स ने जमैका तल्लवाह के आंद्रे रसेल के तूफानी अर्धशतक के बावजूद अपने कम स्कोर का सफल बचाव किया और 14 रन से जीत दर्ज की। इससे वॉरियर्स के भी तीन मैचों में चार अंक हो गए हैं और वो संयुक्त टॉप पर है। वॉरियर्स ने पहले बल्लेबाजी का न्योता मिलने पर ब्रेंडन किंग (29) और चंद्रपॉल हेमराज (21) के बीच पहले विकेट के लिये 56 रन की साझेदारी के बावजूद 19.1 ओवर में 118 रन बनाए। तल्लावाह की तरफ से मुजीब उर रहमान और कार्लोस ब्रेथवेट ने तीन-तीन जबकि संदीप लेमिचाने ने दो विकेट लिए।

तल्लावाह के सामने 119 रन का लक्ष्य था लेकिन 13वें ओवर में उसका स्कोर पांच विकेट पर 48 रन हो गया। रसेल ने अपने स्वभाव के अनुरूप आक्रामक अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए 37 गेंदों पर चार चौकों ओर पांच छक्कों की मदद से नॉटआउट 52 रन बनाए, लेकिन तब भी उनकी टीम सात विकेट पर 104 रन तक ही पहुंच पाई।

 

मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने ट्विटर पर एंट्री मारी है। दरअसल, पहले कंगना रनौत की टीम उस अकाउंट को मैनेज करती थी। लेकिन अब उसकी डोर कंगना ने खुद अपने हाथ में पकड़ ली है। इसकी जानकारी खुद कंगना रनौत ने फैन्स को दी। वीडियो में कंगना ने बताया कि उन्होंने कई ब्रैंड्स को इसलिए मना किया क्योंकि वह चाहते थे कि कंगना ट्विटर जॉइन करें। अब आखिरकार कंगना ट्विटर पर आ ही गई हैं। जैसे ही कंगना ने अपना यह वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, फैन्स ने #BollywoodQueenOnTwitter ट्रेंड करना शुरू कर दिया।

इसके कुछ ही समय बाद कंगना ने एक ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, ‘बॉलीवुड वालों का कहना है, कंगना अपने अजेंडा के चलते ट्विटर पे आई है। आज मैं यह साफ़ कह देना चाहती हूं की हां मेरा अजेंडा है.. 1) राष्ट्रवाद 2) राष्ट्रवाद 3) राष्ट्रवाद’।

इससे पहले सुशांत सिंह राजपूत के पारिवारिक वकील ने कंगना रनौत पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि वह अपने अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए और जिन लोगों से उनको दिक्कत है, उनके खिलाफ स्कोर सेटल करने के लिए हमला बोल रही हैं। वह अपनी ही ट्रिप पर दिखाई दे रही हैं। सुशांत के परिवार का उनके दावों के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है।

हालांकि, विकास सिंह ने यह भी कहा कि कंगना ने कुछ जरूरी मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने कहा, 'सभी को पता है कि इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद चलता है। सुशांत को भी इसका सामना करना पड़ा। लेकिन मामले में यह जांच का प्रमुख बिंदु नहीं है। हां, थोड़ा बहुत जरूर हो सकता है।' उन्होंने आगे कहा कि प्रमुख मामला रिया और उसके गैंग का है, जिसने सुशांत का शोषण किया और न जाने उसे खत्म करने के लिए क्या-क्या किया।

 

मेरी कहानी / शौर्यपथ /आराम की जिंदगी का कोई मुकाबला नहीं। बहुत आनंद होता है, जब जिंदगी का एक ढर्रा तय हो जाता है, कोई जोखिम नहीं, रोज घर से फैक्टरी और फैक्टरी से घर। वही काम, वही लोग, वही जिंदगी। सब कुछ तय समय पर अपनी मर्जी से, तो और क्या चाहिए? उस 18 साल के युवा के साथ भी ऐसा ही था। वह बहुत खुश था, लेकिन किस्मत में कुछ और दर्ज था। उसकी वैसी खुशी कुदरत को मंजूर नहीं थी। एक दिन फैक्टरी का खेल कोच फैक्टरी के खुले अहाते में दहाड़ रहा था। कारखाने में काम करने वाले लड़कों को एक प्रतिस्पद्र्धा में भेजने के लिए चुन रहा था। सब लड़कों को देखने के बाद कड़क कोच ने चार लड़कों को चुना। तीन तो खुश थे, लेकिन चौथा गिड़गिड़ा रहा था, ‘सर, मैं दौड़ नहीं पाऊंगा। सर, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे नहीं होगा।’
कोच ने फटकारा, ‘तुमसे क्यों नहीं होगा?’
युवा ने नरमी से अपनी दाल गलाने की कोशिश की, ‘सर, मैं कभी नहीं दौड़ता। मुझे याद नहीं, मैं पिछली बार कब दौड़ा था, मेरी जगह किसी और को ले लीजिए। मैं दौड़ नहीं पाऊंगा, तो कंपनी का नाम खराब होगा।’
कोच कुछ गंभीर हुआ, ‘लेकिन मुझे लगता है, तुम दौड़ सकते हो।’
अपनी जिंदगी से संतुष्ट युवा सोच रहा था कि कैसे दौड़ने से बचा जाए। खामखा क्यों मुसीबत मोल लें, दौड़ने की जरूरत क्या है? दौड़कर समय और शरीर, दोनों खराब ही होना है। कोच ने कहा, ‘तुम्हें मैंने चुन लिया है। यह सम्मान की बात है। अब चलो, दौड़ो, तुम दौड़ सकते हो और दौड़ना ही है।’
युवा ने फिर बहाना बनाया, ‘सर, मैं दौड़ नहीं सकता, क्योंकि मैं दौड़ने के लिए फिट नहीं हूं। मुझे छोड़ दीजिए सर, आपको और लड़के मिल जाएंगे।’
कोच ने समझाया, ‘तुम्हें क्या हुआ है? अच्छे-खासे तो दिख रहे हो। तुम्हारे पास एक धावक का शरीर है।’नई मेहनत, नवाचार से बचने के लिए युवा ने फिर गुहार लगाई, ‘कृपया, मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं अनफिट हूं।’
लेकिन कोच भी अपने फन का पक्का इंसान था, उसे लग रहा था कि उसने कैसे गलत चयन कर लिया। उसने तत्काल कहा, ‘ऐसा करो, तुम अभी जाओ डॉक्टर के पास, वह अगर बोल दे कि तुम अनफिट हो, तो मैं तुम्हारी बात सुन लूंगा।’
युवा मजबूर हो गया। डॉक्टर ने उसकी जांच करके बताया कि वह दौड़ने के लिए फिट है। जिंदगी में आ गई स्थिरता और आरामतलबी को बचाने के लिए की जा रही उसकी कवायद वहीं ढेर हो गई। कोच के सामने कोई नया बहाना नहीं सूझा। भारी मन लिए भागना पड़ा। ऐसा लगा, जैसे खुद को ही नहीं, दूसरे की जिद और फरमान को भी ढो रहे हैं। अभी भी कोई बहाना चल जाए, तो दौड़ना छोड़ किनारे हो लें। खैर, उस कोच ने दौड़ा ही दिया और बता दिया कि पीछे मुडे़, तो पिछड़ जाओगे। आगे देखने वाला ही अव्वल आता है। तो जैसे-तैसे दौड़ना शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे पोर-पोर खुलता गया, वैसे-वैसे भारीपन कम होता चला गया। कहीं खडे़ रहो और हवा तेज चले, तो ही हवा से बात होती है, पर दौड़ पड़ो, तो शांत हवा से भी बात होने लगती है। रगों में ताकत बनती है और जज्बा बढ़ता है। शरीर में ताकत और सांस का एक क्रम है, जब दौड़ना शुरू होता है, तो यह क्रम अपने आप सहज होता जाता है।
जब असली दौड़ शुरू हुई, तो उस युवा अर्थात एमिल जाटोपेक को एहसास हुआ- वाह, दौड़ना तो लाजवाब है! मेरा तो जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ है। मैं अभी तक क्या कर रहा था, 18 की उम्र तक खुद को दौड़ से बचा रहा था? उस स्पद्र्धा में जाटोपेक कुल 100 धावकों के बीच दूसरे स्थान पर आए थे। यह खुद उनके लिए आश्चर्य की बात थी, बिना अनुभव इतने सारे लड़कों को पछाड़ देना, कुछ ही दिन पहले ख्वाब से भी परे था। उस कोच की जिद और उस पहली दौड़ से जाटोपेक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। मात्र चार साल बाद वह लंबी दौड़ के मुकाबलों में अपने देश चेकोस्लोवाकिया की नुमाइंदगी करने लगे।
1952 ओलंपिक से पहले तो डॉक्टर ने कह दिया था कि तुम फिट नहीं हो, ओलंपिक में भाग मत लो, लेकिन दौड़ने का जुनून ऐसा था कि एमिल जाटोपेक (1922-2000) नहीं माने। उस ओलंपिक में वह 5,000 व 10,000 मीटर दौड़ में स्वर्ण जीत चुके थे। मैराथन दौड़ शुरू होने जा रही थी, किसी ने सुझाव दिया कि बैठे तो हो, इसमें भी दौड़ लो। मैराथन उनका खेल नहीं था, पर जाटोपेक दौड़ गए और पुराना रिकॉर्ड तोड़कर स्वर्ण पाने में कामयाब रहे। तीन स्वर्ण का वह खास रिकॉर्ड आज भी नहीं टूटा है। वह आज रोचक प्रेरणास्रोत हैं। जो इंसान कभी दौड़ना नहीं चाहता था, वह ऐसा दौड़ा कि 18 रिकॉर्ड अपने नाम कर गया।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय एमिल जाटोपेक विश्व प्रसिद्ध धावक

 

जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ /देश को आजादी मिले तीन साल बीते थे। केरल के एक संपन्न परिवार में बेटा पैदा हुआ। उसके दादा और पिता बहुत खुश थे कि खानदान को वारिस मिल गया। लेकिन जो मादियथ नाम के इस बालक को विधाता ने अलग ही मिजाज के साथ भेजा था। जो की परवरिश में किसी अभाव के लिए कोई जगह न थी।
जो अक्सर दादा या पिता के साथ रबड़ की अपनी खेती देखने जाया करते थे। लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें कुछ अलग सा महसूस होता। मासूम मन यह समझ ही नहीं पाता कि हमारे खेतों-बागों में काम करने वाले लोग आखिर हमारी तरह क्यों नहीं खाना खाते? उन्हें क्यों चूहों के बिलों को खोदकर अनाज निकालना पड़ता है? जो जब थोड़े बड़े हुए, तो एक और कड़वी सामाजिक सच्चाई से उनका साबका पड़़ा। दरअसल, एक दिन घर वालों ने तथाकथित निम्न जाति के बच्चों के साथ उन्हें खुले में खेलने से सख्ती से मना किया।
जो को यह पाबंदी बिल्कुल पसंद नहीं आई और शायद उसी वक्त इन विद्रूपों से मोर्चा लेने का ख्याल उनकी चेतना का हिस्सा भी बन गया। कहते हैं, साहसी व्यक्ति पहला प्रयोग अपने ऊपर करता है। जो की उम्र तो उस समय महज 12 साल थी। पर साहसी होने की कसौटी पर खुद को उन्होंने उसी उम्र में आजमाया और अपने ही मजदूरों से कहा कि सब एक साथ मिलकर बेहतर मजदूरी और दूसरी सुविधाओं की मांग करो, तभी पिताजी मानेंगे।
जाहिर है, यह बागी तेवर पिता को नागवार गुजरा। बेटे की बगावती हरकत से चिंतित पिता ने बगैर वक्त गंवाए जो को गांव से दूर एक हॉस्टल में डाल दिया। मगर जो के भीतर तो हकगोई की लौ जल चुकी थी। स्कूल में भी उन्होंने साथी छात्रों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने को प्रेरित किया। अब तक पिता को एहसास हो गया था कि उनका बेटा समाज के लिए ही शायद इस धरती पर आया है। उन्होंने बेटे पर कभी कोई दबाव नहीं बनाया, बल्कि उसकी कोशिशों में सहायक बन गए।
जो मादियथ उन दिनों लोयला कॉलेज, चेन्नई के छात्र संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे। वह गांधीजी के विचारों से काफी प्रभावित थे। जिस तरह बापू ने जनरल क्लास से रेलयात्रा के जरिए असली भारत को जाना-समझा था, उससे प्रेरित होकर जो भी देश के गरीबों और गरीबी को जानने के लिए साइकिल से भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्हीं दिनों में उन्होंने यंग स्टूडेंट्स मूवमेंट फॉर डेवलपमेंट (वाईएसएमडी) नामक एक संगठन बनाया।
बात 1971 की है। देश बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जुटा हुआ था। बड़ी तादाद में शरणार्थी पूर्वी बंगाल से भागकर पश्चिम बंगाल आ गए थे। जो अपने संगठन के 400 साथियों के साथ कोलकाता पहुंचे, ताकि राहत शिविरों के प्रबंधन में प्रशासन का सहयोग कर सकें। जो बताते हैं, ‘कोलकाता के राहत-शिविरों में हैजा फैल गया था। कई लोग उसके शिकार हो गए। मगर कोई उनकी लाश को हाथ लगाने को तैयार न था, तब मैंने और मेरे साथियों ने फैसला किया कि इनके अंतिम संस्कार पूरी गरिमा के साथ होने चाहिए। हम स्वयं ट्रकों से उन्हें ले जाते और उनके अंतिम कर्म करते थे।’ जो और उनके साथियों की इस सेवा भावना से स्थानीय प्रशासन के लोग काफी प्रभावित थे।
दुर्योग से, उसी वर्ष अक्तूबर में ओडिशा में भयानक चक्रवाती तूफान आया। दस हजार से भी ज्यादा लोग मारे गए, जबकि कई लाख लोगों का घर-बार उजड़ गया था। जो अपने 40 साथियों के साथ कोलकाता से ओडिशा पहुंचे। राहत-कार्य के शुरुआती चरणों के पूरे होने पर वाईएसएमडी के युवा जब केरल लौटने लगे, तब जो और कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने ओडिशा में रुककर ही काम करने का फैसला किया।
वहां के आदिवासी इलाकों की गरीबी और भुखमरी ने जो को अंदर तक हिला दिया था। स्थानीय प्रशासन के अनुरोध पर वह अपने कुछ साथियों के साथ गंजाम जिला पहुंचे और 1979 में उन्होंने वहां ‘ग्राम विकास’ नामक संस्था की नींव रखी। जिला प्रशासन ने जो से अनुरोध किया था कि वह आदिवासियों को पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के लिए प्रशिक्षित करें, ताकि वे आधुनिक जीवन से परिचित हों और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। जब जो के साथियों ने आदिवासियों के घर-घर पहुंच उनसे बात की, तो पता चला कि वे लोग मवेशी से दूध निकालने को भारी पाप मानते हैं। वन्य संस्कृति में उन पर सिर्फ उनके छौनों का हक माना जाता है।
चुनौती बड़ी थी, मगर जो की टीम ने दूसरे तरीकों से उन्हें प्रेरित किया, स्थानीय दबंगों द्वारा हड़पी गई उनकी जमीनें उन्हें दिलवाईं, साफ पेयजल के लिए मुहिम चलाई, पेड़ काटने की बजाय बायोगैस के इस्तेमाल के लिए उन्हें राजी किया। बच्चों के लिए स्कूल खोले गए। जो के प्रयासों ने ओडिशा में लगभग 20 लाख लोगों की जिंदगी में बेहतरी की रोशनी फैलाई है। कई नोबेल विजेता इनके कामों की सराहना कर चुके हैं। कौन कहता है कि मसीहा राजधानियों में बसते हैं, सच्चे मसीहा तो वनवासियों के पास हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह जो मादियथ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / बुनियादी हकीकत को भुला देने वाले मुल्क पाकिस्तान को अगर दुनिया में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है, तो कोई आश्चर्य नहीं। अरब दुनिया में अलग-थलग पड़ने लगा पाकिस्तान अब चीन को साथ रखने के लिए और भी मजबूर है। पाकिस्तान की जो आक्रामक व अतार्किक नीतियां हैं, उनके मुताबिक कोई भी समझदार, न्यायपूर्ण देश खुलकर उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता। यह विडंबना है कि पाकिस्तान को भाग-भागकर उस चीन के पास जाना पड़ता है, जिसे उस धर्म की कतई परवाह नहीं है, जिसके आधार पर कभी पाकिस्तान बना था। जहां नमाज पढ़ने और दाढ़ी रखने पर भी पाबंदी लगाई जा सकती है, वहां पाकिस्तान को किस रूप में होना चाहिए? शायद इस पर पाकिस्तान में कम ही लोग विचार करते हैं। वहां का सत्ता प्रतिष्ठान इतनी गहराई तक भारत विरोधी हो चुका है कि अपने देश की पहचान, आदर्श और संपदा की कीमत पर चीन से दोस्ती खरीदना चाहता है। यह बदलाव उसके भटकाव को ही साबित करता है। जिन मुस्लिम मुल्कों को वह अपना सहोदर मानता था, सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात, उनकी बेरुखी भी पाकिस्तान को सुधार के लिए प्रेरित नहीं कर पाई। पाकिस्तान समझ नहीं पा रहा है कि भारत का वजूद पिछले कुछ दशकों में खुद मुस्लिम मुल्कों में किस कदर मजबूत हो चुका है, तो दूसरी ओर, इन्हीं दशकों में पाकिस्तान का वजूद कितना सिमटता जा रहा है।
एक समय था, जब अरब दुनिया में पाकिस्तान की थोड़ी-बहुत सुनी जाती थी, लेकिन विगत चार वर्षों में भारत की व्यापक नीतियां अरब मुल्कों को समझ में आने लगी हैं। इसके अलावा जो धर्म के नाम पर चीन में हो रहा है, वह भी अरब मुल्कों से छिपा हुआ नहीं है। पाकिस्तान इस पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता, पर एक समय आएगा, जब यह बात कहीं न कहीं से उठेगी और तब सबसे ज्यादा तकलीफ पाकिस्तान को होगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री अपने सेना प्रमुख के अरब से लौटते ही चीन पहुंच गए हैं, जहां उनकी चीनी विदेश मंत्री से बात होगी। वहां भले ही यह कहा जा रहा हो कि भारत की कोई चर्चा नहीं होगी, लेकिन यह बात अब छिपी नहीं है कि कश्मीर और भारत विरोधी प्रस्तावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चीन क्यों सक्रिय नजर आता है। संकेत साफ है, चीन और पाकिस्तान की बातचीत का एक मुख्य मुद्दा भारत ही है। खुद को आर्थिक रूप से गिरवी रखते हुए पाकिस्तान जिस तरह से भारत विरोधी सौदे-साजिशें करता आ रहा है, उसे समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से संकेत भी है, पाकिस्तान-चीन के बीच सीपैक, द्विपक्षीय व अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बातचीत होगी, लेकिन साथ ही भारत को चिढ़ाने के लिए उनके विशेषज्ञों ने यहां तक कहा है कि भारत कोविड-19 से लड़ने में अपनी विफलता की खीज चीन और पाकिस्तान पर निकाल रहा है।
कहना न होगा, भारत को चिंता की नहीं, सावधान रहने की जरूरत है। पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी गलत नीतियों के कारण अकेला पड़ रहा है, साजिश हो या विलाप, चीन उसका आखिरी कंधा है। भारत की रणनीति सही है, जो भी देश लोकतंत्र, न्याय, पारदर्शिता, अमन-चैन और सद्भाव के दुश्मन हैं, हिंसा और आतंक के प्रेमी हैं, उन्हें अकेले बैठना ही पड़ेगा। और हमारा काम है, उन पर चौकस नजर रखना।

 

नजरिया / शौर्यपथ / गणेशजी दुनिया के सर्वप्रथम और मौलिक प्रबंधन गुरु हैं। प्रबंध के पुरोधा हैं। आस्था के आकाश और धर्म के धरातल पर भारतीय संस्कृति में वह प्रथम पूज्य भी हैं और अपनी संपूर्ण उपस्थिति में प्रबंधन के प्रेरणा स्रोत भी। वह ऐसे प्रबंधशास्त्री भी हैं, जिनमें हमें पग-पग पर उपयोगी व्यवहार भी दिखता है व नवाचार भी। वह प्रखर प्रबंधक होने के साथ कुशल प्रशासक भी हैं।
एक कुशल प्रबंधन गुरु में पांच विशेषताएं होती हैं। पहली विशेषता है, संस्कारशीलता, दूसरी- व्यवहार कुशलता, तीसरी- संस्थान की हित साधना, चौथी- त्वरित-औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता और पांचवीं- नवाचार के प्रति उत्साह। इन पांचों विशेषताओं की कसौटी पर गणेश विश्व के पहले प्रबंधन गुरु लगते हैं। संस्कारशीलता के संदर्भ में देखें, तो उनमें साहस और समर्पण के संस्कार कूट-कूटकर भरे हैं। एक प्रबंधक के लिए कठिनाइयों से लोहा लेने का साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संस्कार अनिवार्य है। गणेश की संस्कारशीलता अर्थात साहस व समर्पण का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि जब भगवान शिव ने यह उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा कि मेरे विश्राम में कोई व्यवधान नहीं पहुंचाए, तब गणेश रक्षा प्रबंधक के रूप में द्वार पर खडे़ हो गए। किसी कारणवश भगवान परशुराम जब भगवान शिव से मिलने आए, तो गणेश ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया। द्वार के रक्षा प्रबंधक का कर्तव्य निभाया। इस पर क्रोधित हो परशुराम ने गणेश को युद्ध के लिए ललकारा। गणेश में साहस था, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा और युद्ध किया। ऐसी कथा है कि इसी युद्ध में गणेश के एक दांत का क्षय हुआ था, जिसके कारण वह एकदंत कहलाए। दोनों के बीच युद्ध के शोर से भगवान शिव की निद्रा टूटी और उन्होंने आगे बढ़कर दोनों को युद्ध से रोका और अपने पुत्र को साहस व समर्पण अर्थात कर्तव्यनिष्ठा के लिए आशीर्वाद दिया।
तात्पर्य यह है कि प्रबंधन गुरु की प्रथम विशेषता साहस और समर्पण से वह संपन्न हैं। जहां तक व्यवहार कुशलता की बात है, तो यहां भी गणेश विशिष्ट सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए, दूर्वा (एक प्रकार की घास) और मोदक, दोनों के प्रति उनका व्यवहार समान है। उनके पूजन में दूर्वा और भोग में लड्डू का समान महत्व है। इसे कहते हैं, समता का व्यवहार। वह एक हाथ में फरसा अर्थात शक्तिशाली अस्त्र को जितना सम्मान देते हैं, अपने वाहन के रूप में अंगीकार करके मामूली मूषक को भी उतना ही मान प्रदान करते हैं। किसी प्रबंधक की यह विशेषता ही उसे सफल बनाती है कि वह व्यवहार कुशल हो, गुणी का सम्मान करे, किंतु गुणहीन या साधारण का अनादर भी न करे। हां, प्रदर्शन के आधार पर कभी पुरस्कार या चेतावनी का व्यवहार वह कर सकता है।
यदि संस्थान की हित साधना के आधार पर देखें, तो भले ही यह क्षेपक हो, किंतु उदाहरण तो है ही कि जब पार्वतीजी स्नान के लिए गईं, तो गणेश को आदेश दे गईं कि किसी को प्रवेश नहीं करने देना। बाल गणेश को द्वारपाल का काम मिल गया, जब भगवान शिव आए, तो गणेश ने उन्हें भी प्रवेश करने नहीं दिया। भले ही क्रोध में भगवान शिव ने गणेश का मस्तक काट दिया, लेकिन गणेश अपने कर्तव्य या उत्तरदायित्व से पीछे नहीं हटे।
तात्पर्य यह कि कुशल कर्तव्यनिष्ठ खुद को खतरे में डालकर त्याग करते हुए भी संस्थान, समाज, देश की हित-साधना करता है। गणेश जी ने यही किया था।
आज प्रतिस्पद्र्धा का समय है, हर जगह व्यक्तियों व संस्थानों के बीच अव्वल आने की होड़ है। कथा है कि एक प्रतिस्पद्र्धा पौराणिक काल में भी हुई थी। प्रतिस्पद्र्धा में प्रथम आने के लिए गणेश ने श्रीराम लिखकर और माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा करके त्वरित व औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता का परिचय दिया था। वह हमें प्रेरित करते हैं कि कम से कम समय में अच्छे से अच्छे कार्य को कैसे पूरा किया जा सकता है।
जहां तक नवाचार के प्रति उत्साह का मामला है, तो महाभारत के लेखन के समय वेदव्यास द्वारा दी गई कलम टूट जाने पर उन्होंने अपने दांत से ही लेखन कर इस ग्रंथ को पूरा किया था। इससे भी उनका प्रबंधकीय कौशल ही सिद्ध होता है। वह एक ऐसे भगवान हैं, जो हर स्थिति, हर रूप और हर आयु वर्ग में ढल जाते हैं और हमें सहज, सृजनशील और कर्मशील जीवन की प्रेरणा देते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अजहर हाशमी , साहित्यकार व शिक्षाविद्

 

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